नई दिल्ली, अभिषेक सिन्हा : बिहार में वोटर लिस्ट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से 65 लाख हटाए गए मतदाताओं की सूची वेबसाइट और पंचायत भवनों में प्रदर्शित करने को कहा है। कोर्ट ने इस पर टीवी-रेडियो के जरिए व्यापक प्रचार करने का भी निर्देश दिया। बिहार में वोटर लिस्ट रिवीजन का मामला सुप्रीम कोर्ट में है । गुरुवार को भी इस पर सुनवाई हुई । SIR के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से उन 65 लाख मतदाताओं की लिस्ट जारी करने को कहा जो ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल नहीं किए गए थे। अदालत ने कहा कि इस लिस्ट को ज़िला निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर बूथ वार सूची डाली जाए। साथ ही इस सूचना का ज्यादा से ज्यादा प्रचार टीवी और रेडियो पर किया जाए । उसमे इसका उल्लेख करें कि उनका नाम वोटर लिस्ट में शामिल न किए जाने की क्या वजह है। जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि जिनका नाम लिस्ट में नहीं है वह व्यक्ति अपने आधार कार्ड की प्रति के साथ अपना दावा प्रस्तुत कर सकते हैं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वेबसाईट के साथ साथ सभी पंचायत भवनों और खंड विकास एवं पंचायत कार्यालयों के नोटिस बोर्ड पर 65 लाख मतदाताओं की सूची भी प्रदर्शित की जाए। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा आयोग राजनीतिक दलो की लड़ाई में फंस गया है। अगर कोई पार्टी चुनाव में हार जाती है तो वो EVM पर दोष मढ़ती है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने कोर्ट में मेलोड्रामा करने की कोशिश की। कुछ लोगो को बिना किसी एफिडेविट के कोर्ट में पेश किया गया। हमे नही पता कि वो लोग कौन थे हालाकि कोर्ट को बताया गया कि उन्हें आयोग की ओर से मृत दिखाया गया है। आयोग ने इसे अन्यथा न लेते हुए अधिकारियों को इसकी जांच करने को कहा है।
इस बीच बीजेपी ने एक बार फिर कांग्रेस पर हमला बोला है। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि इतिहास गवाह है कि कैसे कांग्रेस पार्टी ने चुनाव परिणाम अपने पक्ष में करने के लिए वोटों का खेल किया। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी के चुनाव को हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया था, जिसमें उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी में एक पोलिंग बूथ में गड़बड़ी की घटना सामने आई थी। बीजेपी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने सोनिया गांधी पर पूछे गए सवाल का जवाब अभी तक नहीं दिया है । उधर चुनाव आयोग ने भी राहुल गांधी द्वारा सरकार पर लगाए गए वोट चोरी के आरोप मामले पर सख्ती दिखाई है। चुनाव आयोग ने कहा है कि ‘एक व्यक्ति एक वोट’ का कानून 1951-1952 में भारत के पहले चुनाव से ही अस्तित्व में है। अगर किसी के पास किसी भी चुनाव में किसी व्यक्ति द्वारा दो बार मतदान करने का कोई सबूत है, तो उसे बिना किसी सबूत के भारत के सभी मतदाताओं को ‘चोर’ बताने की बजाय, लिखित हलफनामे के साथ चुनाव आयोग के साथ साझा किया जाना चाहिए। इसके अलावा चुनाव आयोग ने कहा है कि हमारे मतदाताओं के लिए ‘वोट चोर’ जैसे गंदे शब्दों का इस्तेमाल करके एक झूठी कहानी गढ़ने की कोशिश की गई है। ये न केवल करोड़ों भारतीय मतदाताओं पर सीधा हमला है, बल्कि लाखों चुनाव कर्मचारियों की ईमानदारी पर भी हमला है।

